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ईदुल अज़हा: महज़ मुस्लिम त्यौहार ही नहीं बल्कि मुल्क की तरक्की का ज़रिया भी

ईदुल अज़हा यानी बकरीद का त्यौहार जनपद सहित अधिकांश समूचे देश में मनाया जाएगा। ईदुल फितर यानी ईद को लोग आम तौर पर मीठी ईद या बड़ी ईद कहते हैं और ईदुल अज़हा यानी बकरीद को बकरे की कुर्बानी वाली या छोटी ईद भी कहते हैं। वैसे ईदुल अज़हा की क़ुरबानी का किस्सा तो अधिकतर सभी लोग जानते हैं और हमारा समाज या यूं कहें कि मुस्लिम समाज के लोग महज़ इस त्यौहार की बुनियादी बात ही जानते हैं लेकिन इस त्यौहार से देश का विकास भी किस तरीके से होता है इस बात को शायद ही जानते हैं। आज के इस विशेष लेख के माध्यम से प्रत्येक जगह इस त्यौहार से होने वाले देशव्यापी फायदे को जानेंगे। इस समूचे लेख को मजबूती देने में पत्रकार शीबू खान के साथ हाफ़िज़ शब्बीर रज़ा मिस्बाही, जयपुर (राजस्थान) तालिबे इल्म अल जमीअतुल अशरफिया ने अपने इल्म से महती भूमिका निभाई है।

हाफ़िज़ शब्बीर रज़ा मिस्बाही

बकौल हाफ़िज़ शब्बीर रज़ा मिस्बाही क़ुरबानी का हुक्म अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्ल्लम ने दिया, जो चंद शर्तों के साथ मुसलमान पर वाजिब होती है। इस्लाम धर्म की पवित्र किताब क़ुरान शरीफ़ में पारह 30 के अन्दर अल्लाह ने हुक्म दिया है कि अपने रब के लिये नमाज़ पढ़ो और क़ुरबानी करो। उन्होंने कहा कि क़ुरबानी करना सब पर ज़रूरी नही है बल्कि जिस में सारी शर्तें पायी जाती हो उसी पर क़ुरबानी करना वाज़िब है।
ज़िल्हिज्जा की दसवीं तारीख को ईदुल अज़हा की नमाज़ अदा की जाती है फिर नमाज़ अदा करने के बाद क़ुरबानी की जाती है। क़ुरबानी का वक़्त 3 दिन तक रहता है यानी 10, 11 और 12 ज़िल्हिज्जा की तारीख तक क़ुरबानी का सिलसिला चलता है।
ईदुल अज़हा की नमाज़ व क़ुरबानी के सिलसिले में इस्लामिक किताब का हवाला देते हुए बताया कि सीरते मुस्तफ़ा किताब के मुताबिक सफ़ह 174 में लिखा है कि 10 वीं जिलहिज्जा 2 हिजरी को हुजूर ने बकरईद की नमाज अदा फरमाई और नमाज के बाद दो मेन्ढो की कुर्बानी फरमाई।

जानें क़ुरबानी क्यों की जाती है?

क़ुरबानी ये हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है और क़ुरबानी का सवाब ये है कि हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्ल्लम ने इरशाद फरमाया कि क़ुरबानी के जानवर के हर बाल के बदले में नेकी है इस से हम अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि एक जानवर पर कितना सवाब मिलता होगा?

क़ुरबानी के जानवरों में होती है बरकत

आप देखें कि जिन जानवरों को क़ुरबान किया जाता है उन जानवरों मे कमी नही होती बल्कि उन की तादाद बढ़ती ही है जबकि जिन जानवरों को खाया नही जाता उनकी तादाद मे कमी होती है। क़ुरबानी का एक अहम फायदा ये है कि इससे राष्ट्र की अर्थव्यवस्था हालात मज़बूत होती है।

ईदुल अज़हा की कुर्बानी से देश की अर्थव्यवस्था होती है मजबूत

ईदुल अज़हा पर एक अन्दाज़े के मुताबिक़ 4 खरब रूपए से ज़्यादा का जानवरों का करोबार होता है। तक़रीबन 23 अरब रूपए कसाई मज़दूरी के तौर पर कमाते हैं। 3 अरब से ज़्यादा चारा वाले कमाते हैं जिस का नतीजा ये होता है कि गरीबों को मज़दूरी मिलती है, किसानों का चारा बिकता है और जानवर वालों को जानवरों की अच्छी क़ीमत मिलती है। वहीं अरबों रूपए जानवरों को गाड़ियों में लाने व ले जाने वाले कमाते हैं और इसके बाद गरीब लोगों को महंगा गोश्त मुफ्त मे मिलता है इतना ही नहीं खाल का करोबार अलग होता है जिससे चमड़े की फैक्ट्री मे काम करने वालों को काम भी ज़्यादा मिलता है। यदि उपरोक्त ये सब पैसा जिस – जिस ने कमाया है वो अपनी ज़रुरीयात पर खर्च करते हैं जिससे ना जाने कितने खरब का करोबार दोबारा होता है, वाकई में ये क़ुरबानी सिर्फ गरीब को गोश्त नही खिलाती बल्कि सारा साल गरीबों के रोज़गार और मज़दूरी का भी बन्दोबस्त करती है।
जानकारों का मानना है कि दुनिया का कोई मुल्क करोड़ो – अरबों रूपए अमीरों पर टैक्स लगा कर आया हुआ पैसा गरीबों में बांटना शुरु कर दे तब भी गरीबों और मुल्क को इत्ना फायदा नहीं होता जितना अल्लाह के इस एक हुक्म को मानने से एक मुसलमान मुल्क को फायदा होता है। वहीं अगर अर्थशास्त्र की ज़बान मे बात करें तो धन के संचालन का एक ऐसा चक्कर शुरु होता है जिसका हिसाब लगाने पर अक़्ल भी दंग रह जाती है।

इस तरीके से पढ़ें ईदुल अज़हा की नमाज़

नियत की मैंने दो रकअत नमाज़ वाजिब ईदुल अज़्हा की मय ज़ाइद 6 तकबीरों के, वास्ते अल्लाह तआला के, पीछे इस इमाम के, मुंह मेरा काबे शरीफ़ की तरफ़, इतना कहकर दोनों हाथ कानों तक उठाए और फिर अल्लाहु अकबर कह कर हाथ बाँध ले फिर सना पढ़ेंगे सना के अलफ़ाज़ इस तरह से होंगे
सना- “सुबहाना कल्ला हुम्मा व बिहम्दिका व तबारा कस्मुका व त’आला जद्दुका वला इलाहा गैरुका”। सना पढ़ने के बाद फिर कानो तक हाथ उठाए और अल्लाहु अकबर कहते हुए हाथ छोड दे, फिर दूसरी बार कानों तक हाथ उठाए और अल्लाहु अकबर कहकर हाथ छोड दे, फिर तीसरी बार हाथ उठाए और अल्लाहु अकबर कह कर बाँध लें, और इमाम जो भी पढ़े उसे खामोशी के साथ बिना हिले डुले अच्छे से सुने।
इमाम साहब अऊजु बिल्लाह, बिस्मिल्लाह और सूरए फातिहा और कोई सूरत पढे, मुक्तदी खामोश रहें (यानी इमाम साहब के पीछे पढ़ने वाले खामोश रहे) फिर इमाम साहब के पीछे रुकू व सज्दे करें, इस तरह पहली रकअत पूरी हो गयी। जब दूसरी रकअत के लिये खड़े हों तो इमाम बिस्मिल्लाह सूरए फातिहा और कोई सूरत पढे ( मुक्तदी यहाँ भी खामोश खडे रहे ) जब इमाम साहब अल्लाहु अकबर कहे तो कानों तक हाथ ले जाकर छोड़ दें, एक बार फिर अल्लाहु अकबर कहें तो कानों तक हाथ ले जाकर छोड़ दे फिर से अल्लाहु अकबर कहे तो कानों तक हाथ ले जाकर छोड़ दे और जब चौथी बार फिर से अल्लाहु अकबर कहे तो बगैर हाथ उठाए अल्लाहु अकबर कहते हुए रुकू में जाए और उसके बाद और नमाज़ के मुताबिक नमाज़ पूरी करे । इस तरीके से नमाज़ अदा हो जाएगी।

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